भारत की परमाणु नीति क्या है?भारत ने परमाणु शस्त्रों का विकल्प क्या खुला रखा है?

इसे एक बिडम्बना ही कहा जायेगा कि विश्व को परमाणु तकनीकि की जानकारी पहली बार उसकी विघ्वंसक क्षमता से तब हुई जब द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने जापान के नागासाकी व हिरोशिमा शहरों पर क्रमशः 6 व 9 अगस्त, 1945 को परमाणु हथियारों का हमला किया। संभवतः इसी कारण परमाणु तकनीकि के साथ एक नकारात्मक छबि जुड़ गयी है तथा परमाणु तकनीकि को राष्ट्रों की शक्ति व प्रभाव का प्रतीक माना जाने लगा है। इसीलिये द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बड़े देशों जैसे रूस, ब्रिटेन, फ्रांस तथा चीन में परमाणु तकनीकि अर्जित करने की होड़ लग गयी थी। इन सभी देशों ने 1960 के दशक के मध्य तक परमाणु हथियारों की क्षमता भी अर्जित कर ली थी। परमाणु तकनीकि के विकास की प्रक्रिया में विश्व स्तर पर दो प्रतिक्रियायें सामने आयीं- पहला, परमाणु हथियारों की विघ्वंसक क्षमता को विश्व शांति के लिये खतरा माना गया तथा संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में परमाणु शस्त्रों के नियंत्रण, अप्रसार तथा निःशस्त्रीकरण के प्रयासों को संस्थागत रूप दिया गया। दूसरा, विश्व समुदाय ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के प्रयास भी आररंभ किये, इसमें परमाणु बिजली उत्पादन प्रमुख था। 

भारत का परमाणु कार्यक्रम

भारत भी परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण उपयोग का पक्षधर है। अतः भारत ने 1950 के दशक से ही परमाणु तकनीकि का विकास करने का कार्यक्रम चलाया है। भारत ने विद्युत उत्पादन के लिये अमेरिका, रूस, फ्रांस आदि देशों के साथ मिलकर परमाणु संयंत्ऱों की स्थापना की है। भारत परमाणु बिजली के उत्पादन पर जोर दे रहा है क्योंकि परमाणु बिजली पर्यावरण प्रदूषण की दृष्टि से सुरक्षित है। इस कड़ी में सबसे पहला परमाणु संयंत्र 1959 में अमेरिका की तकनीकी सहायता से लगाया गया था। भारत मे विद्युत उत्पादन, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में परमाणु शक्ति का प्रयोग हो रहा है। वर्तमान में भारत में 22 आणविक संयंत्र कार्यरत है। जिनकी विद्युत उत्पादन क्षमता 6780 मेगावाट है, जो देश के कुल विद्युत उत्पादन का केवल 3.2 प्रतिशत है। इसके साथ ही वर्तमान में 11 नये परमाणु संयंत्रों का निर्माण हो रहा है, जिनकी अतिरिक्त विद्युत उत्पादन क्षमता 8100 मेगावाट होगी।

भारत ने 2025 में न्यूक्लियर इनर्जी मिशन की घोषणा की है, जिसके अन्तगर्त वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु बिजली के उत्पादन का लक्ष्य रखा हैा वर्ष 2025 में ही भारत ने परमणु बिजली उत्पादन में निजी क्षेत्र के प्रवेश के लिये तथा परमाणु संयंत्र सप्लाई करने वाली कम्पनियों पर दुर्घटना जिम्मदारी कम करने क लिये एक नया अधिनियम भी पारित किया है जिसे शान्ति (SHANTI- Sustainable Harnessing and Advancement of of Nuclear Energy for Transforming India) अधिनियम के नाम से जानते हैं। इस कानुन के बन जाने से विदेशी कम्पनियों भी भारत में अपने परमाधु संयंत्र लगोन के लिये आकर्षित होगी। भारत ने परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण प्रयोग की दृष्टि से आवश्यक क्षमता अर्जित कर ली है। लेकिन यूरेनियम के घरेलू स्रोतों की कमी तथा परमाणु ईधन की उन्नत पुनर्संस्करण तकनीकि ( Processing Technology) के अभाव में भारत का परमाणु कार्यक्रम बाधित होता रहा है। फिर भी परमाणु तकनीकि की दृष्टि से भारत ने 2026 में कलपक्कम, तमिलनाडु में अपने फास्ट ब्रीडर परमाणु टेस्ट रियेक्टर को क्रियाशाील कर एक नई सफलता अर्जित की है।

परमाणु परीक्षण तथा भारत का वैश्विक परमाणु अलगाव

भारत ने अपनी परमाणु क्षमता को विकसित करने के लिये दो परमाणु परीक्षण भी किये हैं। इन्हीं परीक्षणों के साथ ही भारत के समक्ष परमाणु नीति की नई चुनौतियां भी खड़ी हो गयीं। भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण 18 मई 1974 को राजस्थान के जैसलमेर जिले के पोखरन नामक स्थान पर किया था। इसका कूट नाम ’स्माइलिंग बुद्धा’ रखा गया हैं। भारत इस परीक्षण को शान्तिपूर्ण आणविक परीक्षण  मानता है। उल्लेखनीय है कि परमाणु तकनीकि दोहरे प्रयोग वाली तकनीकि (Dual Use Technology) है, क्योंकि एक ही तकनीकि का प्रयोग शान्तिपूर्ण कार्यों तथा हथियार बनाने दोनो के लिये किया जा सकता है। अन्तर केवल इतना है कि विद्युत उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले यूरेनियम की परिशुद्धता 3से 5 प्रतिशत होती है जबकि परमाणु हथियारों में प्रयुक्त हाने वाले यूरेनियम की परिशुद्धता लगभग 80 प्रतिशत या इससे अधिक होती है। अतः अमेरिका व अन्य देश भारत के उक्त परीक्षण को शांतिपूर्ण परीक्षण मानने के लिये तैयार नही थे। परिणामस्वरूप इस परीक्षण के उपरान्त अमेरिका तथा अन्य देशों ने भारत के विरूद्ध परमाणु तकनीक व ईंधन देने पर प्रतिबन्ध लगा दिये थे। इस परीक्षण के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप विश्व के परमाणु ईधन सम्पन्न देशों द्वारा 1974 में ही परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह अर्थात न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (Nuclear Suppliers Group-NSG)   की स्थापना की गई। निर्धारित नियमों के अनुसार परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के सदस्य देश केवल उसी देश को शांतिपूर्ण प्रयोग के लिये परमाणु ईंधन व तकनीकि उपलब्ध कराते है, जिसने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non-Proliferation Treaty- NPT) पर हस्ताक्षर कर दिये हो तथा अपने परमाणु संयंत्रों को अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में संचालित करने हेतु सहमति व्यक्त की हो। भारत अपनी विशेष सुरक्षा चुनौतियों के कारण परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की उक्त शर्तों को मनाने के लिये तैयार नही था। अतः भारत के लिये अन्य देशों से परमाणु ईंधन व तकनीकि मिलने के रास्ते बन्द हो गये।  इसके बाद विश्व स्तर पर परमाणु क्षेत्र मे भारत का अलगाव आरंभ हो गया था।

भारत ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण भी 13 मई 1998 को पोखरन में ही किया है। इसी के साथ भारत को अघोषित रूप से परमाणु हथियारों की क्षमता भी प्राप्त हो गयी है। इस परमाणु परीक्षण के बाद भी अमेरिका ने भारत के विरूद्ध प्रतिबन्धों की घोषणा की थी, लेकिन  भारत की स्थिति से सन्तुष्ट होकर अमेरिका ने 2001 में ये प्रतिबन्ध हटा लिये थे।

भारत-अमेरिका शान्तिपूर्ण आणविक समझौता, 2008 तथा भारत के परमाणु अलगाव की समाप्ति

उत्तर-शीत युद्ध काल में भारत तथा अमेरिका के बीच सामरिक सहयोग में उल्लेखनीय प्र्रति हुई है। दोनो देशों ने भारत-अमेरिका शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते पर 2008 में हस्ताक्षर किये गये। यह समर्झाता दोनो देशों के सामरिक संबन्धों में मील का पत्थर है। इस समझौते  के अनतर्गत भारत परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किये बिना ही अमरिका से परमाणु तकनीक व ईंधन प्राप्त कर सकेेगा। यह समझौता भारत के परमाणु काय्रक्रम के बारे में अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के बदले हुये रूख का सबसे बड़ा प्रमाण है। पुनः उल्लेखनीय है कि अमेरिका व अन्य देशों ने भारत के 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद दूसरे देशों से परमाणु तकनीक व ईंधन देने पर रोक लगाा रखी थी। समझौते के बाद भारत को अपरमाणु अप्रसार संधि में हस्ताक्षर किये बिना अमेरिका के प्रयासों से परमाणु परमाणु आपूर्ति कर्ता समूह तथा अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से परमाणq ईधन व तकनीकि के आदान-प्रदान की छूट प्राप्त हुई। इस छूट के बाद ही इस समर्झाते को कार्य रूप् देने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

इस समझौते  का भारत के लिये ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि परमाणु क्षेत्र में 34 वर्षों से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर चल रहा भारत का बहिष्कार समाप्त हो गया। बाद में भारत ने अन्य देशों जैसे रूस, फ्रांस, कजाखिस्तान, जापान, आस्ट्रेलिया आदि देशों के साथ भी भारत ने ऐसे समझौते किये हैं, जिनसे भारत के परमाणु कार्यक्रम के तीव्र विकास के लिये तकनीकि व ईंधन प्राप्त हो सकेगा। यद्यपि अमेरिका के साथ इस समझौते के क्रियान्वयन में कतिपय तकनीकी दिक्कतें आरही है। इन दिक्कतों में भारत में परमाणु संयंत्र लगाने वाली अमेरिकी कम्पनियों  द्वारा दुर्घटना की स्थिति में क्षतिपूर्ति व जिम्मेदारी का मुद्दा प्रमुख है। लेकिन दोनो देशों द्वारा इन दिक्कतों को दूर करने के प्रयास किये जा रहे है।

वैश्विक परमाणु व्यवस्था में भारत का समायोजन

वर्तमान में परमाणु हथियारों के विकास तथ प्रसार पर रोक लगाने के लिये कई अन्तर्राष्ट्रीय कानूनी व्यवस्थायें कार्यरत है। भारत का प्रयास ळै कि भारत इन कानूनी व्यव्स्थाओं में शामिल होकर परमाणु शस्त्र नियंत्रण के वैश्विक प्रयासों में अपना योगदान दे सके तथा परमाणु व्यवस्था में अपनी स्थिति भी मजबूत कर सके। अमेरिका भारत के इन प्रयासों में मदद कर रहा है। इन कानूनी व्यवस्थाओं में भारत की स्थिति निम्नवत है-

1. मिसाइल टेक्नालाॅजी कन्ट्रोल व्यवस्था (Missile Technology Control Regime-MTCR)– यह व्यवस्था 1987 मं अस्तित्व में आयी तथा इसके द्वारा परमाणु मिसाइलों के विस्तार पर रोक लगाई गयी है। भारत ने इसकी सदस्यता 2016 में प्राप्त कर ली है।

2. वैसेनार व्यवस्था (Wassenaar Arrangement)– 33 देशों का यह समूह 1996 में अस्तित्व में आया। इसका उद्देश्य अपमाणु अप्रसार संन्धि पर हस्ताक्षर न करने वाले देशों को दोहरे प्रयोग वाली परमाणु तकनीकि प्राप्त करने पर रोक लगाना है। भारत ने दिसम्बर 2017 में इस समूह की सदस्यता प्राप्त कर ली है।

3. आस्ट्रेलिया समूह (Australia Group)– इसकी स्थापना 1985 में आस्ट्रेलिया के नेतृत्व में हुयी थी। इसमें 41 देश हैं। इसमे ऐसे निर्यात पर रोक लगाई जाती है जिससें नरसंहारक हथियारो ंको बढ़ावा मिल सके। भारत ने जनवरी 2018 में इसकी सदस्यता प्राप्त कर ली है।

4. परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ( Nuclear Supplies Group- NSG) 48 देशों के इस समूह की स्थापना 1974 में की गयी थी। चीन के विरोध के कारण भारत इसकी सदस्यता प्राप्त नही कर सका है। यह समूह उन देशों को परमाणु ईंधन तथा तकनीकि के आयात पर प्रतिबन्ध लगाता है, जिन्होंने परमाणु अप्रसार संन्धि पर हस्ताक्षर नही किये है। डल्लेखनीय है कि चीन मिसाइल टेक्नालाॅजी कन्ट्रोल व्यवस्था, वैसेनार व्यवस्था, तथा आस्ट्रलिया समूह का सदस्य नही है, अन्यथा उसके विरोध के कारण इन तीनो समूहों की भी सदस्यता भारत को नही मिल पाती।

भारत की परमाणु नीति की विशेषतायें

यहां परमाणु नीति ;छनबसमंत च्वसपबलद्ध व परमाणु सिद्धान्त ;छनबसमंत क्वबजतपदमद्ध में अन्तर करना आवश्यक है। परमाणु नीति का तात्पर्य परमाणु शस्त्रों तथा परमाणु ऊर्जा के प्रति दृष्टिकोण से है लेकिन परमाणु सिद्धान्त का संबन्ध परमाणु हथियारों के प्रयोग के मापदण्डों से है। यहां केवल परमाणु नीति की चर्चा की गई है।

उल्लेखनीय है कि भारत ने आधिकारिक तौर पर किसी परमाणु नीति की घोषणा नही की है,  लेकिन परमाणु हथियारों के संबन्ध में उसके दृष्टिकोण के आधार पर भारत की परमाणु नीति की निम्न विशेषतायें स्पष्ट होती हैं-

1. भारत परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के लिये प्रत्येक देश के अधिकार का समर्थक है। भारत भी इसी अधिकार के अन्तर्गत अपने शान्तिपूर्ण परमाणु इनर्जी कार्यक्रम का संचालन कर रहा है। भारत परमाणु इनर्जी के शान्तिपूर्ण उपयोग पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नही चाहता है।

2. भारत परमाणु शस्त्रों को विश्व शांति व सुरक्षा के लिए एक खतरा मानता है। इसीलिए वह परमाणु शस्त्र नियंत्रण (Arms Control) के स्थान पर परमाणु निःशस्त्रीकरण (Disaramament) का समर्थक है। शस्त्र नियंत्रण के स्थान पर परमाणु निःशस्त्रीकरण का समर्थन करता है। भारत परमाणु शस़्त्र नियंत्रण का समर्थन नही करता है। अन्तर यह है कि तहां शस्त्र नियंत्रण के अन्तर्गत हथियारों के आगे विकास पर रोक लगाई जाती है, वहीं निःशस्त्रीकरण में एक श्रेणी के सभी हथियारों को समाप्त किया जाता है।

3. भारत परमाणु निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में सभी प्रकार के भेदभाव का विरोधी है। इसीलिये भारत ने एन0 पी0 टी0 पर हस्ताक्षर नही किये है।

4. भारत परमाणु निःशस्त्रीकरण के आंशिक प्रयासों का विरोधी है। इसका कारण यह है कि परमाणु हथियारो की पहुंच वैश्विक है तथा विश्व के एकक्षेत्र में परमाणु हथियारों पर रोक लगाकर परमाणु हथियारों के खतरे को नही टाला जा सकता है। इसीलिये भारत ने 1970 के दशक में आये इस प्रस्ताव का विरोध किया था कि हिन्द महासागर क्षेत्र को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया जाये।

5. भारत परमाणु निःशस्त्रीकरण के वैश्विक प्रयासों का समर्थन करता है तथा उनमें अपनी सक्रिय भूमिका निभाना है। भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1988 में संयुक्त राष्ट्र के विश्व निःशस्त्रीकरण सम्मेलन में परमाणु निःशस्त्रीकरण का तीन चरणों वाला प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। इसके अतिरिक्त भारत ने परमाणु हथियारों के सभी वैश्विक प्रयासों  का समर्थन व सहयोग किया है। लेकिन परमाणु शक्ति संपन्न देश अपने परमाणु हथियारों को समाप्त करने की बजाय इस बात के लिये प्रयासरत हैं कि दूसरे देश परमाणु हथियार प्राप्त न कर सकें। भारत पश्चिमी देशों की इस नीति का विरोध करता है।

भारत ने परमाणु हथियारों का विकल्प क्यों खुला रखा है ?

भारत  मानता है कि प्रत्येक देश का यह मौलिक अधिकार है कि वह अपनी सुरक्षा और आत्मरक्षा के लिए आवश्यकतानुसार परमाणु हथियारों सहित समुचित उपाय अपनाये। अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं की दृष्टि से ही भारत ने परमाणु हथियारों का अपना विकल्प खुला रखने की नीति अपनायी है।भारत निःशस्त्रीकरण का समर्थक है, लेकिन फिर भी भारत ने अपनी सुरक्षा की दृष्टि से परमाणु हथियार अर्जित करने का विकल्प खुला रखा है। विकल्प खुले रखने का  मतलब यह है कि भारत अपनी अवाश्यकता के अनुसार परमाणु हथियार बना सकता है।

      इस विकल्प को खोले रखने का प्रमुख कारण यह है कि भारत का पड़ोसी देश चीन घोषित रूप से परमाणु हथियार संपन्न देश है, जबकि उसकी सहायता से पाकिस्तान ने भी परमाणु हथियार व मिसाइलों का निर्माण कर लिया है। इन दोनो ही पड़ोसी देशों के साथ भारत के कई युद्ध हो चुके हैं तथा तनावपूर्ण संबन्ध बने रहते है। अतः भारत को अपनी सुरक्षा  के लिये परमाणु हथियारों का विकल्प खुला रखना आवश्यक है।

       पहले अमेरिका व पश्चिमी देश भारत के इस दृष्टिकोण से सहमत नही थे, तथा भारत पर परमाणु हथियारो के  विस्तार पर रोक लगाने वाली परमाणु अप्रसार सन्धि 1968 पर हस्ताक्षर करने पर दबाव डाल रहे थ। लेकिन अब ये देश भारत की सुरक्षा चिन्ताओं के प्रति जागरूक है।यदि ये दोनो देश तथा विश्व के अन्य देश अपने परमाणु हथियारों को समाप्त करने पर सहमत है तो भारत अपने परमाणु हथयारों के विकल्प को बन्द कर देगा।

निष्कर्ष- उक्त विवेचन का निष्कर्ष यह है कि भारत के लिये परमाणु तकनीकि का विकास करना  आवश्यक है। पहला, भारत परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण प्रयोग करते हुये परमाणु वि़द्युत का उत्पादन बढा सकता है। परमाणु वि़द्युत की लागत कम है तथा यह पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। दूसरा, भारत परमाणु हथियारों को विश्व शान्ति के घातक मानता है तथा इन हथियारों को पूरी तरह समाप्त करने के लिये भारत परमाणु निःशस्त्रीकरण की नीति का समर्थन करता है। तीसरा, चीन तथा पाकिस्तान में परमाणु हथियारों के विकास तथा भारत के साथ इन देशों के तनावपूर्ण संबन्धों को देखते हुये भारत को अपने लिये परमाणु हथियारों का विकल्प खुला रखना आवश्यक है। इन तथ्भायों के आलोक में भारत द्वारा अपने परमाणु कार्यक्रम तथा परमाणु नीति का विेकास किया गया है। 2008 के भारत-अमेरिका शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते के बाद यह स्पष्ट को गया है कि भारत की सुरक्षा आवश्यकतायें वास्तविक है, तथा भारत एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक देश है। अतः उसकी विशिश्ट स्थिति के साथ समायोजन किया जा सकता है।

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